सारंडा जंगल में लंबे ऑपरेशन के बावजूद भाकपा (माओवादी) का शीर्ष कमांडर मिसिर बेसरा सुरक्षा बलों की घेराबंदी तोड़कर कोल्हान के जंगलों में पहुंच गया है। सुरक्षा एजेंसियां अब नए सिरे से उसकी तलाश में जुट गई हैं।
Highlights
- 3000 सुरक्षा जवानों की घेराबंदी तोड़कर फरार हुआ मिसिर बेसरा
- सारंडा से निकलकर कोल्हान के जंगलों में पहुंचा माओवादी कमांडर
- एक करोड़ रुपये का इनामी और झारखंड-बिहार-ओडिशा बेल्ट का मोस्ट वांटेड नक्सली
- सहयोगी अजय महतो के साथ लोकेशन बदलने की सूचना
- रात के अंधेरे और लैंड माइंस का उठाया फायदा
- छोटे-छोटे समूहों में बंटकर निकले नक्सली
- बेटे की अपील के बावजूद सरेंडर से किया इनकार
- 2009 में कोर्ट ले जाते समय नक्सलियों ने छुड़ाया था
विस्तार:
सारंडा से निकलकर कोल्हान पहुंचा मिसिर बेसरा
झारखंड, बिहार और ओडिशा बेल्ट का मोस्ट वांटेड और एक करोड़ रुपये का इनामी माओवादी कमांडर मिसिर बेसरा एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने में सफल रहा है। जानकारी के अनुसार, लगभग 3000 सुरक्षा जवानों की घेराबंदी के बावजूद वह सारंडा जंगल से निकलकर कोल्हान के जंगलों तक पहुंच गया है। उसके साथ उसका करीबी सहयोगी अजय महतो भी मौजूद बताया जा रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों को अब उसकी लोकेशन सारंडा के जराइकेला क्षेत्र से करीब 40 किलोमीटर दूर कोल्हान के जंगलों में मिलने की सूचना मिली है। इसके बाद सुरक्षा बलों ने नए सिरे से तलाशी अभियान तेज कर दिया है।
कई दिनों से चल रहा था बड़ा नक्सल विरोधी अभियान
पिछले महीने केंद्रीय सुरक्षा बलों, झारखंड जगुआर और राज्य पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर मिसिर बेसरा और उसके दस्ते को चाईबासा के सारंडा जंगल के जराइकेला, गोइलकेरा और बलिबा क्षेत्र तक सीमित कर दिया था। सुरक्षा बलों ने जंगल में कई अस्थायी कैंप भी स्थापित किए थे ताकि नक्सलियों की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सके।हालांकि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और घने जंगलों के कारण अभियान चुनौतीपूर्ण बना रहा।
रात का फायदा उठाकर तोड़ी घेराबंदी
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जंगल में बड़ी संख्या में लैंड माइंस बिछी होने की आशंका के कारण सुरक्षा बल रात के समय सीमित गतिविधियां ही कर पा रहे थे। इसी स्थिति का फायदा उठाकर मिसिर बेसरा अपने सहयोगी के साथ सबसे पहले घेराबंदी से बाहर निकल गया।
इसके बाद अन्य नक्सली भी छोटे-छोटे समूहों में बंटकर अलग-अलग रास्तों से जंगल छोड़कर नए ठिकानों तक पहुंच गए। यही वजह रही कि इतने बड़े अभियान के बावजूद सुरक्षा बल उन्हें पकड़ने में सफल नहीं हो सके।
कैडर कमजोर, लेकिन अब भी चुनौती बरकरार
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मिसिर बेसरा पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुका है। उसके संगठन की कैडर शक्ति लगातार घटी है और कई इलाकों में उसका प्रभाव भी कम हुआ है। इसके बावजूद वह अब भी भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेताओं में शामिल है और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सरेंडर की अपील भी ठुकराई
झारखंड पुलिस ने मिसिर बेसरा को मुख्यधारा में लाने के लिए उसके परिवार और बेटे के माध्यम से संपर्क साधने की कोशिश की थी। बेटे ने उसकी बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए आत्मसमर्पण करने की भावनात्मक अपील भी की थी।
लेकिन पुलिस के मुताबिक मिसिर बेसरा ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह किसी भी परिस्थिति में हथियार नहीं डालेगा और सरेंडर नहीं करेगा।
2009 में पुलिस हिरासत से हुआ था फरार
गिरिडीह जिले के पीरटांड़ का रहने वाला मिसिर बेसरा 1980 और 1990 के दशक में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) से जुड़ा था। बाद में वह संगठन के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गया।
वर्ष 2007 में उसे गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2009 में चाईबासा कोर्ट ले जाने के दौरान नक्सलियों ने विस्फोट कर पुलिस वाहन पर हमला किया और उसे हिरासत से छुड़ा लिया। तब से वह लगातार फरार है और कई राज्यों की पुलिस के लिए सबसे बड़े वांछित नक्सली नेताओं में शामिल है।
