झारखंड आंदोलन के महानायक को मरणोपरांत मिला देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया अलंकृत
हाइलाइट्स
- दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रदान किया सम्मान
- पत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया पुरस्कार
- अलग झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े नायक रहे शिबू सोरेन
- जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के प्रतीक थे दिशोम गुरु
- झारखंड के लिए ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण
खबर विस्तार
झारखंड के लिए गौरव का क्षण
झारखंड के जननायक, आदिवासी अस्मिता की बुलंद आवाज और अलग झारखंड राज्य आंदोलन के सबसे बड़े नायकों में शुमार दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया। नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान प्रदान किया। दिशोम गुरु की ओर से उनकी धर्मपत्नी रूपी सोरेन ने यह सम्मान ग्रहण किया।
यह सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि झारखंड की पहचान, संघर्ष, संस्कृति और उन लाखों लोगों के सपनों का सम्मान है, जिन्होंने शिबू सोरेन के नेतृत्व में अपनी आवाज को बुलंद होते देखा।
कौन थे दिशोम गुरु शिबू सोरेन?
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिनकी हत्या महाजनी प्रथा और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के कारण कर दी गई थी। पिता की हत्या ने युवा शिबू सोरेन के मन में अन्याय के खिलाफ संघर्ष की आग जला दी।
उन्होंने आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों और गरीबों के अधिकारों की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया। गांव-गांव घूमकर उन्होंने लोगों को संगठित किया और जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए आंदोलन शुरू किया।
झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे
अगर झारखंड आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा तो शिबू सोरेन का नाम उसके केंद्र में होगा। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को जन-जन तक पहुंचाया और इसे राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बनाया।
1970 के दशक में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को मजबूत किया और आदिवासियों के हक की लड़ाई को नई दिशा दी। उनके नेतृत्व में वर्षों तक चले आंदोलन का परिणाम था कि 15 नवंबर 2000 को झारखंड भारत का 28वां राज्य बना।
यही वजह है कि झारखंड के लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “दिशोम गुरु” यानी “जनता का महान शिक्षक और मार्गदर्शक” कहकर पुकारते हैं।
राजनीतिक सफर: संघर्ष से सत्ता तक
शिबू सोरेन कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। वे केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी बने। झारखंड बनने के बाद वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे।
हालांकि उनका राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिन जनता के बीच उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। ग्रामीण इलाकों में आज भी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाता है, जिसने गरीबों और आदिवासियों के लिए संघर्ष को अपना धर्म बना लिया।
जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के प्रतीक
दिशोम गुरु का नाम सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। वे आदिवासी पहचान, संस्कृति और अधिकारों के सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे। उन्होंने विस्थापन, भूमि अधिग्रहण, शोषण और महाजनी प्रथा के खिलाफ लगातार संघर्ष किया।
झारखंड के गांवों में आज भी उनके आंदोलन की कहानियां सुनाई जाती हैं। हजारों युवाओं ने उनके संघर्ष से प्रेरणा लेकर सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कदम रखा।
भारत रत्न की मांग भी उठती रही
झारखंड मुक्ति मोर्चा और राज्य सरकार की ओर से कई बार शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग उठाई गई। राज्य कैबिनेट ने भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था।
हालांकि फिलहाल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है, लेकिन झारखंड के कई राजनीतिक और सामाजिक संगठन मानते हैं कि उनके योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया जाना चाहिए।
राष्ट्रपति भवन में भावुक पल
जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पद्म भूषण सम्मान प्रदान किया, तो वह क्षण पूरे झारखंड के लिए गर्व और भावनाओं से भरा हुआ था। समारोह में मौजूद लोगों ने इसे झारखंड आंदोलन के संघर्षों की राष्ट्रीय पहचान बताया।
दिशोम गुरु की धर्मपत्नी रूपी सोरेन ने सम्मान ग्रहण करते हुए पूरे सोरेन परिवार और झारखंड की जनता की ओर से आभार व्यक्त किया।
झारखंड के लिए क्यों खास है यह सम्मान?
यह सम्मान सिर्फ शिबू सोरेन को नहीं, बल्कि झारखंड की उस पूरी पीढ़ी को समर्पित है जिसने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया। यह सम्मान उन आदिवासी समुदायों की पहचान का भी सम्मान है, जिनकी आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में दिशोम गुरु की सबसे बड़ी भूमिका रही।
आज से दिशोम गुरु सिर्फ झारखंड के जननायक नहीं, बल्कि “पद्म भूषण शिबू सोरेन” के रूप में देश के इतिहास में दर्ज हो गए हैं।
