Wednesday, April 22, 2026
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नगर निगम आरक्षण नीति पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, याचिका खारिज

धनबाद और गिरिडीह में मेयर पद के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला

Highlights

  • नगर निगम को दो वर्गों में बांटने की नीति पर याचिका खारिज
  • धनबाद और गिरिडीह के मेयर पद आरक्षण को चुनौती दी गई थी
  • झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका खारिज की
  • याचिकाकर्ता ने नीति को संविधान विरोधी बताया था
  • राज्य सरकार ने नीति का बचाव किया

विस्तार

हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला

रांची : नगर निगम को दो वर्गों में बांटने को चुनौती देने वाली याचिका को झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ, मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने शांतनु कुमार चंद्र की याचिका पर यह फैसला सुनाया।

क्या थी याचिका?

याचिकाकर्ता शांतनु कुमार चंद्र ने राज्य सरकार की उस नीति को चुनौती दी थी, जिसमें जनसंख्या के आधार पर धनबाद में मेयर का पद अनारक्षित और गिरिडीह में अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित किया गया था।

प्रार्थी का कहना था कि 2011 की जनगणना के अनुसार धनबाद में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 2 लाख है, इसलिए वहां मेयर का पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होना चाहिए था।

इसके विपरीत, गिरिडीह में अनुसूचित जाति की आबादी केवल करीब 30 हजार है, लेकिन वहां मेयर का पद आरक्षित कर दिया गया।

संविधान विरोधी नीति का आरोप

याचिकाकर्ता ने सरकार की नीति को संविधान के खिलाफ बताया और कहा कि आरक्षण नीति में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है।

राज्य सरकार का पक्ष

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन और अपर महाधिवक्ता सचिन कुमार ने अदालत में पक्ष रखा और सरकार की नीति का समर्थन किया।

हाईकोर्ट का निर्णय

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

 

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