डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में 21वीं सदी के हिंदी साहित्य में आदिवासी जीवन-संदर्भ पर गहन मंथन
Highlights
- रांची स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
- विषय: 21वीं सदी के हिंदी साहित्य में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संदर्भ
- राज्यसभा सांसद महुआ मांझी रहीं मुख्य अतिथि
- रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह रहे विशिष्ट अतिथि
- हिंदी साहित्य में आदिवासी जीवन, संघर्ष, संस्कृति और चेतना पर विस्तार से चर्चा
- शिक्षाविदों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों की रही सक्रिय भागीदारी
विस्तार
रांची : झारखण्ड की राजधानी रांची स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य और आदिवासी विमर्श को लेकर एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक और वैचारिक पहल देखने को मिली। विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की ओर से “21वीं सदी के हिंदी साहित्य में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संदर्भ” विषय पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस संगोष्ठी में राज्यसभा सांसद महुआ मांझी कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं, जबकि रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान हिंदी साहित्य के माध्यम से आदिवासी समाज के जीवन, संघर्ष, संस्कृति, पहचान और चेतना को समझने और उसे मुख्यधारा में लाने पर गंभीर विमर्श हुआ।
मुख्य अतिथि महुआ मांझी ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी साहित्य में आदिवासी जीवन की अभिव्यक्ति केवल साहित्यिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी सोच से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पीड़ा, संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत को साहित्य में स्थान मिलना देश की सांस्कृतिक विविधता को मजबूती देता है।
वहीं, विशिष्ट अतिथि डॉ. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि 21वीं सदी का हिंदी साहित्य समाज के हाशिये पर खड़े वर्गों की आवाज़ को स्वर देने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। आदिवासी विमर्श, साहित्य को अधिक संवेदनशील, मानवीय और यथार्थवादी बनाता है।
संगोष्ठी में देश-विदेश से जुड़े शिक्षाविदों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विचार साझा किए। वक्ताओं ने आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, समकालीन चुनौतियों और साहित्य में उनकी प्रस्तुति पर गहन चर्चा की।
कार्यक्रम में हुई सार्थक बहस और विचार-विमर्श से यह आयोजन साहित्यिक के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।
