रांची विश्वविद्यालय परिसर में भव्य आयोजन, कुड़ुख-हो-मुंडारी-संथाली कलाकारों की शानदार प्रस्तुति
Highlights
- सरहुल पूर्व संध्या पर रांची में भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम
- सरना नवयुवक संघ के तत्वावधान में आयोजन
- जनजातीय लोकनृत्यों ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध
- मांदर की थाप पर पारंपरिक प्रस्तुतियां
- सरहुल के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश

विस्तार
रांची। सरहुल पूर्व संध्या के अवसर पर राजधानी रांची में आदिवासी संस्कृति का भव्य और जीवंत आयोजन देखने को मिला। सरना नवयुवक संघ की केंद्रीय समिति के तत्वावधान में रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम ने परंपरा, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।
पारंपरिक पूजा से हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान और पूजा-अर्चना के साथ हुई। सरहुल पर्व की गरिमा को ध्यान में रखते हुए प्रकृति और साल वृक्ष के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई।
लोकनृत्यों ने बांधा समां
इसके बाद मंच पर विभिन्न जनजातीय समुदायों के कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से पूरे माहौल को जीवंत बना दिया। कुड़ुख, हो, मुंडारी, संथाली और नागपुरी संस्कृति से जुड़े कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में मांदर की थाप पर थिरकते नजर आए। उनकी ऊर्जा और लोक रंग से भरपूर प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, वहीं पूरा परिसर तालियों की गूंज से गूंज उठा और उत्सव का माहौल चरम पर पहुंच गया।
सरहुल का महत्व
कार्यक्रम के दौरान सरहुल पर्व के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। बताया गया कि सरहुल प्रकृति और नवजीवन का प्रतीक है, जिसमें साल वृक्ष की पूजा कर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। यह पर्व आदिवासी समाज की गहरी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है, जो प्रकृति और मानव के बीच संबंध को मजबूत करने का संदेश देता है।
बड़ी संख्या में जुटे लोग
इस भव्य आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का भरपूर आनंद उठाया। आयोजनकर्ताओं के अनुसार इस तरह के कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करना और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं व जड़ों से जोड़ना है, ताकि सांस्कृतिक विरासत आने वाले समय में भी सजीव बनी रहे।
संस्कृति का उत्सव
यह आयोजन न सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा, बल्कि आदिवासी परंपराओं, पहचान और गौरव का भी उत्सव बना।