Thursday, February 26, 2026
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NCERT की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले यह योजनाबद्ध कदम

बिना शर्त माफी से संतुष्ट नहीं कोर्ट; ऑनलाइन सामग्री हटाने और जिम्मेदारों की पहचान के निर्देश

Highlights

  • कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
  • CJI सूर्यकांत ने जताई कड़ी नाराजगी
  • केंद्र की बिना शर्त माफी को कोर्ट ने बताया अपर्याप्त
  • 32 हार्ड कॉपी बाजार से वापस लेने की प्रक्रिया शुरू
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने के निर्देश
  • अगली सुनवाई 11 मार्च को

विस्तार

नई दिल्ली। एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक अध्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी 2026) को सख्त रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने मामले को गंभीर बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक त्रुटि नहीं, बल्कि प्रथम दृष्टया एक योजनाबद्ध कदम प्रतीत होता है।

केंद्र की माफी पर असंतोष

केंद्र सरकार की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि संबंधित अध्याय तैयार करने वाले दो व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय कर दी गई है और भविष्य में उन्हें किसी भी शैक्षणिक या सरकारी संस्थान में कार्य करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि केवल माफी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी गहराई से जांच आवश्यक है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में ऐसी त्रुटियां दोबारा न हों।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका के संबंध में इस प्रकार की सामग्री बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच गलत संदेश दे सकती है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक अकादमिक त्रुटि का मामला नहीं है, बल्कि संस्थाओं की गरिमा और विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है।

सीजेआई ने यह भी स्पष्ट किया कि यह जानना आवश्यक है कि इस अध्याय के प्रकाशन के पीछे किन-किन लोगों की भूमिका रही और संपादन व अनुमोदन की प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था। उन्होंने संकेत दिया कि जवाबदेही तय किए बिना मामला समाप्त नहीं माना जा सकता।

बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचौली ने भी मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि संबंधित सामग्री को तत्काल प्रभाव से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से हटाया जाना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी या भ्रामक संदेश आगे न फैले।

किताबें और डिजिटल कंटेंट वापस लेने के निर्देश

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित अध्याय वाली 32 प्रतियां बाजार में पहुंची थीं, जिन्हें वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। साथ ही, पूरी पुस्तक की समीक्षा किए जाने की बात भी कही गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि हार्ड कॉपी से अधिक सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। इस पर अदालत ने ऑनलाइन कंटेंट हटाने के निर्देश देने को कहा। सॉलिसिटर जनरल ने आश्वस्त किया कि विभाग के पास डिजिटल सामग्री हटाने की वैधानिक शक्ति है और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

सुनवाई जारी रहेगी

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल विवादित अध्याय को हटाना पर्याप्त नहीं है, और सिर्फ माफी मांग लेने से भी मामला समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि जब तक इस प्रकरण में जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट नहीं की जाती और जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने संकेत दिया कि संस्थागत प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है।

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