चांडिल : शरद पूर्णिमा पर बुधवार की रात भक्तिभाव से कोजागरी लक्खी पूजा की गई| बंगाली समाज की मान्यता के अनुसार इस दिन मां लक्खी धरती पर विचरण करती हैं. दिवाली से पहले यही ऐसा दिन है, जब मां लक्खी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है| माना जाता है कि रात को माता लक्खी धरती पर आती हैं| जो उनकी पूजा और उनके नाम का स्मरण करता है, उस पर मां लक्खी विशेष कृपा बरसाती हैं|
इसलिए इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं| कोजागरी का मतलब है कि कौन जाग रहा है| चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में कोजागरी लक्खी पूजा पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है| दुर्गा पूजा आयोजन स्थलों के अलावा अन्य स्थानों में प्रतिमा स्थापित कर और मां लक्ष्मी की फोटो पर पूजा-अर्चना की जाती है| शारदीय नवरात्र के बाद आने वाले शरद पूर्णिमा के दिन मां कोजागरी लक्खी की पूजा की जाती है| कोजागरी पूर्णिमा की रात को दीपावली से भी अधिक खास माना जाता है, क्योंकि इस रात स्वयं मां लक्खी अपने भक्तों को संपत्ति देने के लिए आती हैं|
