अवैध खनन पर प्रशासन की मिलीभगत के आरोप, खनन विभाग बोला—जल्द होगी बालू घाटों की नीलामी
Highlights:
- चतरा में अवैध बालू खनन चरम पर
- नदियों से दिन-रात हो रहा बालू उठाव
- लावालौंग में ग्रामीणों ने ट्रैक्टर रोककर किया हंगामा
- प्रशासन पर मिलीभगत के गंभीर आरोप
- खनन विभाग का दावा—71 FIR, 152 वाहन जब्त
- 22 बालू घाटों की नीलामी तकनीकी कारणों से अटकी
विस्तार
चतरा में बालू माफियाओं का बोलबाला
झारखंड के चतरा जिले में इन दिनों बालू माफियाओं का बोलबाला है। हालात ऐसे हैं कि सरकारी नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं, जबकि माफिया दिन-रात नदियों से अवैध बालू उठाव कर रहे हैं। इससे न सिर्फ सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है, बल्कि नदियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।
नदियों पर बढ़ता खतरा, पहले भी आई थी आपदा
इटखोरी की मुहाने नदी, धुना घाट और टोना टांड जैसे इलाकों में लगातार अवैध खनन जारी है। पिछले मानसून में पीतीज गांव में आई बाढ़ का कारण भी अवैध बालू कटाव ही था, जिसकी पुष्टि खुद प्रशासन ने की थी। इसके बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं।
लावालौंग में ग्रामीणों का उग्र विरोध
नक्सल प्रभावित लावालौंग प्रखंड के कल्याणपुर चौक पर ग्रामीणों ने अवैध बालू लदे ट्रैक्टरों को रोककर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान माफियाओं और ग्रामीणों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी। ग्रामीणों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक स्थानीय लोगों का है, न कि माफियाओं का। उन्होंने उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है।
जनप्रतिनिधियों ने भी जताई चिंता
चतरा विधायक जनार्दन पासवान ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा कि अंधाधुंध खनन से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है और भविष्य में जल संकट व बाढ़ जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
खनन विभाग का दावा बनाम जमीनी हकीकत
जिला खनन पदाधिकारी मनोज टोप्पो के अनुसार फरवरी 2026 तक 71 FIR दर्ज की गई हैं, 152 वाहनों को जब्त किया गया है और 39 लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया है। साथ ही 22 बालू घाटों की 45 करोड़ रुपये में नीलामी भी हो चुकी है, जो तकनीकी कारणों से फिलहाल रुकी हुई है।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि अगर कार्रवाई हो रही है, तो फिर हर रात सैकड़ों ट्रैक्टर कैसे नदियों से बालू निकाल रहे हैं?
भ्रष्टाचार और पर्यावरण पर खतरा
आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। एक ओर सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है, तो दूसरी ओर पर्यावरण को भारी क्षति पहुंच रही है। यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में चतरा को फिर किसी बड़ी आपदा का सामना करना पड़ सकता है।

