दरभंगा राजघराने की परंपराओं को संजोने वाली महारानी ने कल्याणी निवास में ली अंतिम सांस
Highlights
- दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी और अंतिम महारानी का निधन
- छह महीनों से थीं बीमार, कल्याणी निवास में ली अंतिम सांस
- युवराज कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा रवाना
- अंतिम संस्कार श्यामा माई मंदिर परिसर में राजपरंपरा अनुसार होगा
- 1940 में हुआ था महारानी का विवाह; 1930 में जन्म
- कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना, 15 हजार पुस्तकों वाला पुस्तकालय दिया
- मिथिला संस्कृति की संरक्षणकर्ता, एक युग का अवसान
विस्तार
मिथिला अंचल के लिए आज एक ऐतिहासिक युग का अंत हो गया। दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी और अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया। पिछले छह महीनों से बीमार चल रहीं महारानी ने दरभंगा के कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। निधन की सूचना मिलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
अंतिम संस्कार की तैयारी, राजपरंपरा का पालन
निधन की खबर मिलते ही युवराज कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से तुरंत दरभंगा के लिए रवाना हो गए। ट्रस्ट और राजघराने से जुड़े लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गए हैं। परंपरा के अनुरूप महारानी का अंतिम संस्कार श्यामा माई मंदिर परिसर में किया जाएगा, जहाँ राजपरिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार वर्षों से होता आया है।
1940 में हुआ था विवाह, रियासत का आखिरी अध्याय
महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 1930 में हुआ था। 1940 में महाराज कामेश्वर सिंह ने उनसे विवाह किया था। इससे पहले वे महारानी राजलक्ष्मी देवी और महारानी कामेश्वरी प्रिया से विवाह कर चुके थे। कामेश्वर सिंह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक थे, जिनका निधन 1962 में हुआ। पहली पत्नी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में, जबकि दूसरी पत्नी कामेश्वरी प्रिया का 1940 में ही निधन हो गया था।
कल्याणी फाउंडेशन—सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
महाराज के निधन के बाद महारानी कामसुंदरी देवी ने उनकी स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की। फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने महाराजा के नाम पर एक विशाल पुस्तकालय बनवाया, जिसमें आज भी 15,000 से अधिक पुस्तकें संरक्षित हैं। सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहकर उन्होंने मिथिला की धरोहर को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्यामा माई मंदिर—परंपरा का केंद्र
श्यामा माई मंदिर, जिसे महाराज रामेश्वर सिंह की चिता स्थल पर बनाया गया था, आज मिथिला का एक प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक केंद्र है। इसी पवित्र स्थल पर राजघराने के सदस्यों का अंतिम संस्कार होता है और अब महारानी कामसुंदरी देवी की अंत्येष्टि भी यहीं की जाएगी।
एक युग का अवसान
महारानी के निधन को मिथिला के लोग सिर्फ एक मृत्यु नहीं, बल्कि एक पूरे युग के अंत के रूप में देख रहे हैं। उनकी संस्कृति-सेवा, समर्पण और विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी।
