Highlights:
- दिशोम गुरु का निधन के बाद पहला जन्मदिन, पूरा झारखंड भावुक
- परिवार और गांववालों ने नेमरा में याद किया—“बाबा आज भी हमारे बीच हैं”
- बचपन से आंदोलन तक—5 बड़े किस्से जो बताते हैं उनका पूरा जीवन
- सीएम हेमंत सोरेन और JMM ने भावुक होकर लिखा—“बाबा टूटे नहीं, थके नहीं”
- जल–जंगल–जमीन की लड़ाई और धन-कटनी आंदोलन आज भी मिसाल
विस्तार
दिशोम गुरु की जयंती: निधन के बाद पहला जन्मदिन, झारखंड भावुक – याद आ रहे संघर्ष के वो किस्से
झारखंड की राजनीति, संस्कृति और अस्मिता का दूसरा नाम ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन। आज उनका जन्मदिन है—लेकिन पहली बार बिना उनकी भौतिक उपस्थिति के झारखंड उन्हें याद कर रहा है। 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के बाद आज 11 जनवरी का दिन राज्य के लिए श्रद्धा, भावनाओं और स्मृतियों से भरा हुआ है। नेमरा गांव से लेकर रांची के मोरहाबादी तक, आदिवासी अंचलों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक—आज हर कोई ‘बाबा’ को याद कर रहा है।
नेमरा में पहली बार महसूस हुई कमी—“बाबा आते थे, कंबल बांटते थे”
मरा में पहली बार महसूस हुई कमी—“जो आते थे, कंबल बांटते थे… अब गांव सूना लगता है”
गोला प्रखंड के नेमरा, धोरधोरा और आसपास के गांव इन दिनों गहरे भावुक हैं।
यह वही इलाका है, जिसने एक आंदोलनकारी का बचपन देखा था… वही धरती जिसने संघर्ष के बीज दिए, और आज वही गांव पहली बार एक ऐसी कमी को महसूस कर रहा है जिसे शब्दों में बयान करना कठिन है।
नेमरा के बुजुर्ग बताते हैं कि जब भी वह गांव लौटते थे, लोग अपने-आप जुट जाते थे। “पहले हाल-चाल पूछते, फिर कहते—काहें परेशान बा? और शाम तक जरूरतमंदों के बीच कंबल बांट देते थे। अब वो नहीं आते… गांव खाली-खाली लगता है,” एक बुजुर्ग की आवाज भर आती है।
स्थानीय लोग याद करते हैं—
• गांव में कहीं बच्चा जन्म ले ले, तो सबसे पहले परिवार की मदद के लिए पहुंचते
• हमेशा समझाते—“नशा छोड़ो, बच्चों को पढ़ाओ-लिखाओ”
• अपने जश्न से अधिक गांववालों के हाल पर ध्यान देते
नेमरा की मिट्टी आज भी इन यादों को संभाले हुए है। लोग कहते हैं— “कुछ लोग जाते नहीं… बस दिखते नहीं। उनकी कमी पहले कभी इतनी महसूस नहीं हुई थी जितनी अब हो रही है।”
दिशोम गुरु: वो संघर्ष, जिन्होंने उन्हें ‘मसीहा’ बनाया
1957 में लुकैयाटांड जंगल में एक दर्दनाक घटना हुई, जब सूदखोर साहूकारों ने उनके पिता की हत्या कर दी। सिर्फ 15 साल की उम्र में यह सदमा उनके भीतर विद्रोह की चिंगारी बनकर जल उठा और यहीं से एक आंदोलनकारी का जन्म हुआ। आगे चलकर एक गांव में जमीन विवाद सुलझाते ही एक बुजुर्ग ने कहा—“ई त आदमी नै, दिशोम गुरु हें!” और यही उपाधि फिर कभी उनसे अलग नहीं हुई।
संघर्ष का सफर यहीं नहीं रुका। तुंडी और पारसनाथ के जंगलों में रात के स्कूल खोले गए, जहाँ मजदूरों के बच्चे पढ़ते थे, महाजनी शोषण के खिलाफ समझ दी जाती थी और शराबबंदी का अभियान चलाया जाता था। इसी दौरान धन-कटनी आंदोलन खड़ा हुआ—सूदखोरों द्वारा कब्जाई गई फसल को रात में साथियों के साथ काटकर असली किसान को लौटाया जाता था। यह कदम झारखंड के इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
इन सबके बीच कई बार जेल गए, सज़ा मिली, पर आंदोलन नहीं छोड़ा। 2007 में दुमका जेल ले जाए जा रहे काफिले पर बम हमला तक हुआ, मगर न साहस टूटा, न संघर्ष की राह छूटी। इसी जज़्बे ने लोगों के दिल में उन्हें मसीहा बना दिया—दिशोम गुरु।
हेमंत सोरेन का भावुक पोस्ट—“बाबा टूटे नहीं, थके नहीं”
“मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा आज, मेरे बाबा, दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी की जन्मजयंती है। यह मेरे लिए महज एक महान नेता का जन्मदिन नहीं है, बल्कि उस पिता की याद है जिन्होंने मुझे जीवन जीने की कला सिखाई, संघर्ष करना सिखाया और सबसे महत्वपूर्ण, बिना झुके अपनी गरिमा, मूल्यों और सच्चाई पर अडिग रहना सिखाया। बाबा ने पूरे जीवन अन्याय के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। उन्होंने जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। मैंने उन्हें कई बार थका हुआ देखा, लेकिन टूटते कभी नहीं देखा। उनकी वो अटूट इच्छाशक्ति और दृढ़ता आज भी मेरे अंदर जीवित है। एक पुत्र के नाते मैंने उनसे सादगी सीखी, मुश्किलों से कभी पीठ न दिखाने का साहस सीखा, और सत्ता को हमेशा जन-सेवा का माध्यम मानना सीखा। बाबा, आपके दिखाए मार्ग पर, आपके दिए आदर्शों पर मैं जीवन भर चलता रहूँगा, चाहे कितनी भी चुनौतियाँ आएँ। जय झारखंड! जय दिशोम गुरु! आपकी स्मृति हमेशा अमर रहे।।”
यह पोस्ट पढ़कर हजारों लोग भावुक हो गए।
कल्पना सोरेन का संदेश—“घर यादों से भरा है… लेकिन खाली भी”
वहीं कल्पना सोरेन ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा आज बाबा की जयंती है। झारखंड के साथ हमारा घर उनकी यादों से भरा है, पर उनकी कमी से एक अजीब सी ख़ामोशी भी है। उनके बिना, परिवार का मतलब ही अधूरा लगता है। वो हमारी नींव थे, हमारी आत्मा थे। उन्होंने हमें सिखाया कि असली परिवार ईमानदारी, सम्मान और एक-दूसरे के साथ खड़े रहने से बनता है। आप नहीं हैं पर आपके सिखाए हुए मूल्य हमेशा हमारे साथ हैं। आपका हमारे साथ आज नहीं होना हमें याद दिलाता है कि अब हमें एक-दूसरे के लिए और मजबूत बनना है, और उनकी विरासत को आगे बढ़ाना है। बाबा, आप हमारे दिलों में हमेशा बसे हो। हम सब आपको याद करते हैं और आपको नमन करते हैं।
चंपई सोरेन ने दी श्रद्धांजलि
“पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं झारखंड आंदोलन के मजबूत स्तंभ रहे दिशोम गुरु आदरणीय शिबू सोरेन जी की जयंती पर शत शत नमन।”
बाबूलाल मरांडी ने भी दी श्रद्धांजलि
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने लिखा— झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिबु सोरेन जी की जयंती पर उन्हें सादर नमन।
राज्य भर में श्रद्धांजलि – एक नेता नहीं, आंदोलन की आत्मा को याद
- नेमरा में ग्रामीणों ने कंबल वितरण किया जैसे वे किया करते थे
• धोरधोरा में आदिवासी ढोल नगाड़े से स्मरण
• रांची में मोरहाबादी आवास पर भीड़
• कई जगह मशाल जुलूस
• छात्र संगठनों ने “आदिवासी अस्मिता दिवस” मनाया
हर जगह सिर्फ एक ही आवाज “दिशोम गुरु अमर रहें।
दिशोम गुरु—एक नेता नहीं, झारखंड की आत्मा
आज झारखंड सिर्फ एक नेता को नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को याद कर रहा है। उनका संघर्ष हर संथाल, हर किसान, हर मजदूर की आवाज बन चुका है। और उनकी विरासत करोड़ों लोगों को प्रेरित करती रहेगी। दिशोम गुरु अमर रहें। जय झारखंड।
