नृत्य-गान, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच गूंजा संताल संस्कृति का रंग
Highlights:
- गिरिडीह कॉलेज परिसर में संताल समाज का महान पर्व सोहराय आयोजित
- आदिवासी छात्र संघ द्वारा पारंपरिक विधि-विधान से कार्यक्रम का आयोजन
- नायके बाबा द्वारा गोट सीम बोंगा और दाअ दुल पूजा
- पारंपरिक नृत्य-गान से परिसर हुआ सांस्कृतिक ऊर्जा से सराबोर
- मांदर-तमाक की थाप पर थिरके युवक-युवतियां
- सीम सोड़े (प्रसाद) का वितरण
- संताल संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक एकता का संदेश
विस्तार
पारंपरिक विधि-विधान से हुई शुरुआत
गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह के छात्रावास मैदान में आदिवासी छात्र संघ के तत्वावधान में संताल समाज का महान पर्व सोहराय पूरे पारंपरिक उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रातः नायके बाबा द्वारा जिला मांझी थान, बस स्टैंड के समीप गोट सीम बोंगा (पूजा) से की गई।
मांझी थान में जल अर्पण
पूजा के उपरांत मांझी थान में दाअ दुल (जल अर्पण) किया गया, जहां समाज की सुख-शांति, समृद्धि और एकता की कामना की गई। यह आयोजन संताल समाज की आस्था और परंपराओं को दर्शाता नजर आया।
सम्मान और संस्कार की झलक
पूजा-अर्चना के बाद छात्राओं ने संताल परंपरा के अनुसार मांझी बाबा एवं नायके बाबा का पैर धोकर सम्मान प्रकट किया। यह दृश्य संताल समाज की गहरी सामाजिक मर्यादा, सम्मान और संस्कारों का प्रतीक बना।
नृत्य-गान से सजी सांस्कृतिक संध्या
इसके बाद गिरिडीह जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए संताल समाज के युवक-युवतियों ने पारंपरिक नृत्य-गान प्रस्तुत किया।मांदर और तमाक की थाप पर पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने पूरे कॉलेज परिसर को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।
सीम सोड़े का प्रसाद और सोहराय का महत्व
कार्यक्रम के समापन पर सभी उपस्थित लोगों ने सीम सोड़े (मुर्गा बिरयानी) को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। वक्ताओं ने बताया कि सोहराय पर्व संताल समाज का सबसे बड़ा पर्व है, जो
- भाई-बहन के प्रेम,
- प्रकृति से जुड़ाव,
- और पशुधन के सम्मान का प्रतीक है।
इस अवसर पर गाय, भैंस सहित अन्य पशुओं की पूजा की जाती है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में गांवों और शहरों में समान उत्साह से मनाया जाता है।
गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति
इस भव्य आयोजन में कई समाजसेवी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे, जिनमें —
आदिवासी छात्र संघ अध्यक्ष प्रदीप सोरेन,सचिव मदन हेंब्रम,श्याम सुंदर हांसदा, संतान मरांडी, सिकंदर हेंब्रम,प्रवीण मुर्मू, मुजी लाल टुडू, दिलीप मुर्मू,चांद सोरेन, सोना लाल मुर्मू, मिरु लाल मरांडी,अनिल हेंब्रम, रेणुका हांसदा, रोशीना सोरेन,नुनु राम किस्कू, दशरथ किस्कू, शमीर मुर्मू,मुन्नी मुर्मू एवं सुधीर बास्के प्रमुख रूप से शामिल रहे।
सांस्कृतिक विरासत का संदेश
कार्यक्रम ने संताल समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सशक्त रूप से प्रस्तुत करते हुए सामाजिक एकता, परंपरा संरक्षण और सांस्कृतिक गौरव का संदेश दिया।
