कला संगम द्वारा अधिवक्ता संघ भवन में स्वदेश दीपक लिखित नाटक ‘कालकोठरी’ का मंचन, कलाकारों के संघर्ष ने दर्शकों को किया भावविभोर
Highlights:
- गिरिडीह में नाटक ‘कालकोठरी’ का सफल मंचन
- कलाकारों के जीवन संघर्ष पर आधारित है कथानक
- संस्कृति विभाग की असंवेदनशीलता और लालफीताशाही पर तीखा प्रहार
- सभी कलाकारों के सशक्त अभिनय को मिली भरपूर सराहना
- दर्शकों की मौजूदगी और तालियों की गूंज से गूंजा सभागार
अधिवक्ता संघ भवन में जीवंत हुआ रंगमंच
गिरिडीह के अधिवक्ता संघ भवन के हॉल में कला संगम के तत्वावधान में स्वदेश दीपक लिखित और सतीश कुन्दन निर्देशित नाटक ‘कालकोठरी’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। नाटक का डिज़ाइन नीतीश आनंद ने तैयार किया। मंचन के दौरान सभी कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा।
कलाकारों के जीवन संघर्ष की सच्ची तस्वीर
नाटक का कथानक रंगमंच से जुड़े कलाकारों के जीवन संघर्ष पर आधारित है। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह कलाकार पारिवारिक दबाव, आर्थिक तंगी और व्यवस्था की उपेक्षा के बावजूद रंगमंच से जुड़े रहते हैं। नाटक में संस्कृति विभाग के अधिकारियों की असंवेदनशीलता और लालफीताशाही को भी बेबाकी से उजागर किया गया।
रजत और मीनाक्षी की भूमिका ने छोड़ी गहरी छाप
रजत की भूमिका में नीतीश आनंद ने एक बेरोजगार लेकिन प्रतिभाशाली कलाकार का जीवंत चित्रण किया। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी न कर पाने पर पत्नी के तानों और नौकरी की तलाश में संस्कृति विभाग में अपमान झेलने का दृश्य दर्शकों को भीतर तक झकझोर गया।
मीनाक्षी की भूमिका में सुजात कुमारी ने सशक्त अभिनय कर खूब तालियां बटोरीं।
दोहरी भूमिकाओं में कलाकारों का कमाल
रविश आनंद ने महेंद्र और बलवंत की दोहरी भूमिका निभाकर अपनी अभिनय क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
अंशिका आनंद ने लंगड़े बच्चे अंगद की भूमिका में अभावग्रस्त परिवार में पल रहे मासूम बच्चे की पीड़ा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया।
भावुक कर देने वाले दृश्य
शोभा और कांता की दोहरी भूमिका निभा रहीं संस्कृति आनंद के साथ भूखे बच्चे का दृश्य और पिता की डांट ने दर्शकों की आंखें नम कर दीं।
रजत के पिता की भूमिका में शुभम कुमार ने एक संवेदनशील सेवानिवृत्त कर्मचारी का किरदार निभाया, जो बेटे की मानसिक स्थिति को समझते हैं।
व्यवस्था पर करारा प्रहार
संस्कृति विभाग के निदेशक की भूमिका में अनुराग सागर ने प्रभावी अभिनय के जरिए यह दिखाया कि कैसे कला की समझ से दूर अधिकारी कलाकारों का अपमान करते हैं।
वसुंधरा की भूमिका में अनुष्का सिन्हा ने नौकरी की तलाश में भटकती कलाकार की पीड़ा को सशक्त रूप में उकेरा।
सबसे भावनात्मक क्षण
लेखक नवीन वर्मा की भूमिका में इंद्रजीत मिश्रा ने आदर्शवादी लेखक का चरित्र निभाया। उनकी पत्नी की भूमिका निभा रहीं अर्पिता का दिवंगत बच्चे को याद कर रोने वाला दृश्य पूरे नाटक का सबसे भावनात्मक क्षण रहा, जिसे दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से सराहा।
तकनीकी पक्ष भी रहा मजबूत
नाटक में संगीत और प्रकाश संयोजन का दायित्व विकास रंजन ने बखूबी निभाया, जिससे मंचन और प्रभावशाली हो गया।
दीप प्रज्वलन के साथ उद्घाटन
कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ कला संगम के संरक्षक राजेन्द्र बगडिया, उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिन्हा, सचिव सतीश कुन्दन, संयोजक चुन्नूकांत, बिनय बक्शी, अरित चंद्रा, मदन मांझर्वे और राजीव रंजन ने संयुक्त रूप से किया।
कलाकारों को मिला प्रोत्साहन
चुन्नूकांत ने नाटक की प्रशंसा करते हुए कलाकारों को उपहार और नकद देकर प्रोत्साहित किया।
नकद प्रोत्साहन देने वालों में मनोज कुमार मुन्ना, राजीव रंजन, संजीव रंजन, सुनील भूषण, कृष्ण कुमार सिन्हा और बिनय बक्शी शामिल रहे।
संरक्षक राजेन्द्र बगडिया ने सभी कलाकारों को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
बड़ी संख्या में दर्शक रहे मौजूद
कार्यक्रम में दर्शकों की उपस्थिति सराहनीय रही। इस मौके पर कला संगम से जुड़े कई कलाकार, बुद्धिजीवी और रंगप्रेमी मौजूद रहे।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष कृष्णा बाबू ने किया।
