यदि कोई अपनी अज्ञानता में भारतीय न्यायपद्धति को अपमानित करता है, तो उसे भारतीय न्यायपालिका के बारे में भ्रम है कि वह इस अपमान के बदले में दंडित करेगा। लेकिन, सच तो यह है कि हमारी न्यायपद्धति की सोच इतनी विशाल है कि वह उस व्यक्ति को दंड देने के बदले क्षमा कर देता है। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। यहां तक कि जब एक सिरफिरा सुप्रीम कोर्ट के लिए अनापशनाप कहता है, तो उसे भी माफ कर दिया जाता है। यह हमारी न्याय व्यवस्था का लचीलापन है, अन्यथा पिछले दिनों जिस तरह एक सांसद द्वारा देश के प्रधान न्यायाधीश के ऊपर सरेआम आरोप लगाया तो, वह क्षमा योग्य कतई नहीं था, लेकिन वह सांसद बच निकला। अभी पिछले दिनों देश के प्रधान न्यायाधीश के ऊपर भरी अदालत में जिस तरह जूता उछाला गया, उसे तो देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है, लेकिन ऐसे लोग भरे समाज में खुलेआम घूम रहे हैं और अपनी हरकतों को न्यायसंगत बताते हुए समाज को बरगलाने का भरसक प्रयास करते हैं। न्याय के पक्षधरों ने इसे न्याय प्रणाली पर हमला बताया है और हमलावर की भर्त्सना भी की जा रही है। लेकिन, न्याय प्रणाली और सर्वोच्च न्यायाधीश की अवहेलना जो होनी थी, वह तो हो ही गई। उसे खारिज करने का जितना प्रयास किया जाएगा, उससे न्यायपालिका की उतनी ही बदनामी होगी। फिलवक्त यह एक अलग विषय है, लेकिन इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ टिप्पणी की है, उसे तो एक नज़ीर ही माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम 2021 के तहत सदस्यों की नियुक्ति कार्यकाल और सेवा शर्तों से संबंधित प्रावधानों को रद्द कर दिया और कहा कि संसद कानून लाकर न्यायिक आदेश को पलट नहीं सकती। इसे केंद्र सरकार के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि पहले से खारिज प्रावधानों को मामूली बदलाव के साथ नए कानून के रूप में फिर से लागू कर दिया गया है। अदालत ने कहा कि भारतीय सांवैधानिक ढांचा संसदीय संप्रभुता का समर्थन नहीं करता और न ही न्यायपालिका को बिना शर्त सर्वोच्चता प्रदान करता है। पीठ ने यह भी कहा कि केंद्र की यह दलील सही है कि न्यायालय संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने को बाध्य नहीं कर सकता, फिर भी अदालत के पास संसद द्वारा बनाए गए कानून की बाध्यता, जनहानि का अधिकार और वास्तव में सांवैधानिक दायित्व, निर्विवाद रूप से बना रहता है। न्यायिक समीक्षा संविधान की मूलभूत विशेषता है। संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने के लिए बाध्य करने में असमर्थता का अर्थ संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को आंख मूंदकर स्वीकार करना कतई नहीं है। देश के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अध्यादेश के पुराने प्रावधानों को कानून में वापस लाने के लिए केंद्र सरकार पर तीखी टिप्पणी की।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ ऐसे निर्णय लिए गए हैं जिससे अब यह स्पष्ट दिखने लगा है कि शीर्ष अदालत अपने पिछले निर्णय पर देश की टिप्पणी से आहत है और सरकार को चेताया है कि देश को मनमाने तरीके से चलाने का सर्वाधिक अधिकार जनता ने उसे नहीं दिया है। उसी तरह के निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपालों व राष्ट्रपति के विधायक पर मंजूरी के लिए समय—सीमा कोर्ट तय नहीं कर सकता। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विधेयकों को स्वतः स्वीकृति का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोई भी विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के बिना कानून नहीं बन सकता। पांच जजों की संविधान पीठ ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सर्वसम्मति से दी गई राय में कहा कि विधेयकों पर निर्णय लेने के संबंध में राज्यपाल को विवेकाधिकार है और वह इसमें मंत्रिपरिषद की सलाह से नहीं बंधे हैं, लेकिन राज्यपाल विधेयक को लटकाकर नहीं रख सकते। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के कई राज्यों पर प्रभाव डालने वाला है, इसलिए क्योंकि इससे पिछले 8 अप्रैल को दो जजों का फैसला निष्प्रभावी हो जाता है। मालूम हो कि राज्यों के विधेयकों पर निर्णय के संबंध में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय—सीमा तय करने के साथ ही राज्यपाल द्वारा रोके रखे गए तमिलनाडु के दस विधेयकों को मंजूरी दे दी गई थी। यह पहला अवसर था, जब सीधे कोर्ट के आदेश से विधेयकों को मंजूरी मिली थी।
राष्ट्रपति ने पूछा था कि जब संविधान अनुच्छेद 200 और 201 में विधेयकों पर निर्णय लेने के संबंध में राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय—सीमा तय नहीं है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट समय—सीमा तय कर सकता है? संविधान पीठ ने जस्टिस जेबी पादरीवाला की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ द्वारा विधेयकों की मंजूरी के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए तीन महीने की समय—सीमा तय करने और विधेयकों को मान्य स्वीकृति देने को गलत ठहराया है। पीठ ने कहा कि अदालत की ओर से निर्धारित समय—सीमा खत्म होने वाले विधेयक को राज्यपाल या राष्ट्रपति की स्वीकृति मान लेना न्यायिक घोषणा के रास्ते न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के कार्यों पर कब्जा करना और उन्हें बदलना है, जो संविधान में स्वीकृत नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 142 का उपयोग संविधान के स्पष्ट प्रावधानों के विरुद्ध किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए नहीं किया जा सकता। इन आदेशों में खास बातें यह रहीं कि विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के बिना कानून नहीं बन सकता, क्योंकि बिलों को मंजूरी देने, रोकने या सुरक्षित रखने के राज्यपाल और राष्ट्रपति के कार्य न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते। किसी विधेयक के कानून बनने से पहले अदालत उसकी विषयवस्तु की समीक्षा नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि सांवैधानिक पाठ भले ही अंग्रेजों से प्रेरित हों, लेकिन इसकी व्याख्या और कार्य प्रणाली सच में स्वदेशी है ।
जजों की सीमित संख्या होने के बावजूद देश की बड़ी से बड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए न्यायाधीशों को कितनी मेहनत करनी होती है, यह सोचकर ही शरीर में सिहरन होने लगती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी व्यक्ति विशेष के लिए होता है, तो उसका असर देश के लगभग प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ता है। जजों की इतनी बेशुमार मेहनत के बावजूद आलोचना होने लगी थी कि कोर्ट तो सरकार के निर्देशों पर काम करना शुरू कर दिया है। सच तो यह है कि न्यायालय को जितना अधिकार हमारा संविधान देता है, उसके अनुसार उसकी व्याख्या करके यदि उसके द्वारा निर्णय दिया जाता है, तो जरूर कुछ लोग उसकी तारीफ करेंगे कुछ आलोचना भी करेंगे। एक आम आदमी के मन में यह बैठ गया है कि अदालत का झुकाव सरकार के पक्ष में जाने लगा है। यदि सच यही है तो एक सामान्य जनता अपने न्याय की गुहार फिर कहां करेगा? यह एक बड़ा गंभीर प्रश्न आमलोगों के मन में बैठता जा रहा है। यह भी कहीं न कहीं सच है कि इस बीच कुछ ऐसे ताबड़तोड़ निर्णय दिए गए जिसे समाज के अधिकांश वर्ग ने नकारा, लेकिन हर किसी की भारत में उतनी क्षमता नहीं है कि आदेश के विरोध में अपनी गुहार लगा सके। इसलिए अब तक तो समाज सरकार से डरकर रहता आया है, लेकिन न्याय पर भी अब खुलेआम आरोप लगने लगा है आपकी पकड़ जितनी होगी, समाज सहित सरकार तथा न्याय भी उतनी ही होगी। अभी कोर्ट ने कुछ निर्णय देना शुरू ही किया है कि समाज ने उससे राहत की सांस लेना शुरू कर दिया है तथा जिन फैसलों का ऊपर उल्लेख किया गया है, उसका क्या असर देश, समाज और सरकार पर पड़ता है, यह देखने के लिए तो फिलहाल थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। निश्चित रूप से न्यायपालिका एक अलग स्तंभ है जिसका दुरुपयोग यदि सत्ता के लिए किया जाने लगेगा, तो यह अहितकर हम सबके साथ पूरे समाज के लिए होगा। लेकिन, इस धारणा को निवर्तमान सीजेआई बीआर गवई ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार के खिलाफ यदि फैसला नहीं दिया, तो जज स्वतंत्र नहीं हैं। यह विचार गलत है, क्योंकि न्यायपालिका स्वतंत्र है। एक जज के बारे में यह सोचने से संपूर्ण न्यायपालिका पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जाना चाहिए।
लेखक- निशिकांत ठाकुर
