चैनपुर : दुखनी देवी का दुःख और विपती देवी का विपत पूर्णत: सरकारी संवेदनहीनता का परिणाम है न कि मिचोंग तूफान जैसे प्राकृतिक आपदा का कहर l डाकिया योजना अंतर्गत सरकार द्वारा दी जाने वाली आदिम जनजाति परहिया परिवारों को मिलने वाला खाद्यान्न विगत अगस्त महीने से पीढ़े गाँव के 54 परिवारों को नहीं मिली है l
जिसके कारण सभी परहिया परिवारों के समक्ष खाद्य संकट गहरा गया है l उनकी दैनिक खाद्य जरूरतों में अप्रत्याशित गिरावट देखी जा रही है l परिवारों ने सामान्य दिनों की अपेक्षा सरकारी अनाज न मिलने की वजह से प्रतिदिन के भोजन में आधी मात्रा से ही गुजारा करने को विवश हैं l
कमोबेस सभी आदिम जनजाति परिवारों से मजदूरी करने योग्य पुरुष 2 से 3 माह पूर्व गाँव छोड़कर बैंगलोर, चेन्नई शहरों को मजदूरी की तलाश में पलायन कर गए हैं l सिर्फ परहिया परिवारों से पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या 90 से अधिक है l गाँव में सिर्फ महिलाएँ, बुजुर्ग और उनके बच्चे शेष रह गए हैं l महिलाओं ने अपनी ब्यथा ब्यक्त करते हुए बताया कि जो लोग भी बाहर कमाने गए हैं अभी तक एक पैसा भी खर्चे के लिए घर नहीं भेज पाए हैं l हाँ फोन पर बात होती है तो उनके लोग बोलते हैं कि काम मिल गया है.
महिलाओं ने दैनिक खाद्य जरूरतों के इंतजामात के बारे बताया कि दशहरा के पहले का दुकानों में बहुत उधार हो गया है l फिर चकवड का बीज के सीजन आया तो करीब 15 दिनों तक सभी महिलाएँ आस – पास और जंगलों चकवड का बीज इक्कठा कर उसे स्थानीय महाजनों को बेचती थीं l एक दिन में 2 से तीन किलो बीज संग्रहित कर पाते थे जिसके लिए 20 रूपये किलो बेचकर 36 रूपये चावल खरीद खा रहे हैं l चकवड बीज का सीजन अब ख़त्म हो गया है l
अब हमलोग तुलसी बीज संग्रहित कर बेचना शुरू ही किये थे कि मिचोंग तूफान के प्रभाव से जो 3 – 4 दिनों तक लगातार बारिश हो गई उसने पूरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया l यह बीज 18 रूपये बिकना प्रारंभ हुआ था लेकिन अब पानी आ जाने से इसकी कहानी पूरी तरह समाप्त हो गई l मनरेगा में काम और मजदूरी के बाबत उन्होंने बताया कि कोई काम खुले तब तो काम करेंगे l लेकिन दुखद पहलू यह भी पाया गया कि किसी भी परिवार के पास रोजगार कार्ड नहीं है l पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि गाँव के ठेकेदार 10 – 12 सालों पहले ही काम खोलने के नाम पर सबों से कार्ड ले लिए फिर कभी रोजगार कार्ड वापस दिएl
प्रशासनिक संवेदना मर चुकी है गाँव की 35 महिलाओं ने 30 अगस्त को ही अपनी समस्या को लिखित तौर पर सरकारी मुलाजिमों अवगत करा दिया है l झारखण्ड राज्य खाद्य आयोग के सदस्य सचिव के पत्रांक WA/568/2023 के माध्यम से जिला आपूर्ति पदाधिकारी को 15 दिनों में आवेदन पर कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए हुए आयोग को अवगत कराने का निर्देश दिया गया था l इसके बाद भी न तो जिला आपूर्ति पदाधिकारी ने कोई कार्रवाई की और न ही इतने दिनों तक आयोग ने पुन: कोई संज्ञान लिया l ग्रामीणों ने राशन सम्बन्धी समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय में धरना भी दिया l ग्रामीणों की मानें तो सरकार गरीबों की सुनने वाला नहीं है l सिर्फ पीढ़े गाँव के आदिम जनजाति ही नहीं चैनपूर और रामगढ़ प्रखण्ड के 33 गाँव के कोरवा और परहिया परिवार राशन की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं l यहाँ बतौर डम्मी डीलर के एम० ओ० हैं लेकिन राशन वितरण का पूरा कारोबार निजी ब्यक्तियों के हाथों में भगवान भरोसे प्रशासन ने छोड़ दिया है l
आंगनबाड़ी का लाभ किसी आदिम जनजाति बच्चे को नहीं मिलता है
जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दक्षिण में रामगढ़ प्रखण्ड अंतर्गत बांसडीह पंचायत में अवस्थित है पीढ़े गाँव l यह खतियानी आदिवासियों के साथ ही साहू, भुइयाँ परिवार निवास करते हैं l यह गाँव चैनपुर बरवाडीह मुख्य पथ पर अवस्थित अवश्य है किन्तु परहिया परिवार जिस टोले में रहते हैं खासकर पानी खोचा और केदला टोला l इन टोलों तक पहुँचने के लिए कोई समुचित पहुँच पथ नहीं है l गाँव में प्रभावशाली लोगों की वजह से इस टोले तक कोई सरकारी विकास योजना भी लोगों को नहीं मिलती है l 6 वर्ष से 25 से अधिक बच्चे हैं जो आंगनबाड़ी सुविधा से पूर्णत: वंचित हैं क्योंकि गाँव के मुख्य टोला में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र तक बच्चों का दैनिक तौर पर पहुंचना नामुमकिन है l
नील गायों के कारण खेतों के फसल बचाना मुश्किल
एक ओर इस वर्ष ससमय बारिश न होने की वजह से खेती नहीं हो पाई l दूसरा परिवारों में पुरुष सदस्यों के नहीं रहने के कारण कुरथी, सुरगुजा जैसी फसलों को नील गायों बिल्कुल भी बचा नहीं पाते हैं l कुल मिलाकर देखा जाए तो न घर में खेती किसानी के लिए पुरुष सदस्य घरों में हैं और न ही खेती को नील गायों से बचाने के लिए l परिणाम उनके खेत सूने पड़े रह जाते हैं l
महीने में 4 दिन दाल खा पाते हैं विपती देवी और उनका परिवार
विपति देवी के घर में कुल 9 सदस्यों का खाना एक साथ बनता है l यदि डाकिया योजना का अनाज मिलता है तब उस पूरे अनाज से किसी तरह 10 से 15 दिनों का खाद्य जरुरत पूरा हो पाता है l शेष दिनों वो लोग बाजार से अनाज खरीद कर काम चलाते हैं l उनको पेंशन मिलती है जिससे महीने में दो बार करके अरहर दाल खरीद खाते हैं यह दाल उनको 100 से 130 रूपये किलो खरीदनी पड़ती है l उनका कहना था कि सामान्य दिनों में उनके घर में प्रतिदिन सुबह शाम मिलाकर 10 किलो चावल बनता है लेकिन अनाज न मिलने की वजह से उनको महज 6 किलो प्रतिदिन अनाज से संतोष करना पड़ रहा है l ठीक इसी तरह बुधन परहिया शारीरिक रूप से बेहद कमजोर और बुजुर्ग हैं किन्तु सरकारी दस्तावेज में उम्र कम होने की वजह से उनको वृद्धावस्था पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है l
