नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों की संपत्ति से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार मंदिर की जमीन की मालिक नहीं, बल्कि उसकी संरक्षक और नियामक होती है। सरकार को मंदिर की संपत्ति पर निगरानी और प्रबंधन से जुड़े अधिकार मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वह उस जमीन को अपनी संपत्ति मानकर इस्तेमाल कर सकती है। अदालत ने इसी आधार पर तमिलनाडु में मंदिर की जमीन सरकार को उपहार में देने के लिए तैयार किए गए एक दस्तावेज को अमान्य घोषित कर दिया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व फैसले को पलटते हुए कहा कि धार्मिक संस्थान की संपत्ति का इस्तेमाल उसके निर्धारित उद्देश्य और हितों के अनुरूप होना चाहिए। किसी ट्रस्टी की अच्छी मंशा भी उसे मंदिर की जमीन मनमाने ढंग से किसी अन्य संस्था या सरकार को सौंपने का अधिकार नहीं देती।
तालुक कार्यालय बनाने के लिए दी गई थी मंदिर की जमीन
यह मामला तमिलनाडु में एक मंदिर की जमीन से जुड़ा है। 30 अगस्त 2017 को मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने उपहार विलेख के माध्यम से जमीन राज्य सरकार को हस्तांतरित कर दी थी। इस जमीन पर तालुक कार्यालय बनाने की योजना थी। इस हस्तांतरण को अदालत में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मंदिर की संपत्ति को सरकार के नाम करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था और ट्रस्टी के पास ऐसा करने का अधिकार भी नहीं था। मार्च 2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने इस चुनौती को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां संपत्ति की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों की विस्तार से जांच की गई।
मंदिर की जमीन देवता को समर्पित संपत्ति है
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में धार्मिक संपत्ति की कानूनी स्थिति पर जोर दिया। अदालत के अनुसार, किसी देवता को समर्पित संपत्ति का स्वामित्व ट्रस्टी के व्यक्तिगत अधिकार में नहीं रहता। ट्रस्टी की भूमिका उस संपत्ति का संरक्षण और निर्धारित धार्मिक उद्देश्य के लिए उसका प्रबंधन करना है। पीठ ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959 के तहत राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को मंदिर की संपत्तियों के नियमन का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, नियामक की भूमिका को संपत्ति के मालिकाना हक के बराबर नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करते समय ट्रस्टियों को धार्मिक संस्थान के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बिना किसी प्रतिफल के जमीन दान कर देना सामान्य तौर पर संस्थान के हित में उचित प्रबंधन नहीं माना जा सकता।
धारा 41 के तहत उपहार विलेख को माना अमान्य
मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल यह था कि मंदिर की जमीन के हस्तांतरण पर कौन-सा कानूनी प्रावधान लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संबंधित जमीन धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण और देखरेख के लिए दी गई इनाम संपत्ति थी। इसलिए इस मामले में अधिनियम की धारा 41 महत्वपूर्ण थी। अदालत के अनुसार, इस प्रावधान के तहत ऐसी संपत्ति को उपहार के रूप में हस्तांतरित करना अमान्य है। कानून कुछ परिस्थितियों में धार्मिक संस्थान के हित में विशेष लेन-देन की अनुमति देता है, लेकिन उपहार के रूप में जमीन देने को उस प्रक्रिया के जरिए वैध नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा हस्तांतरण शुरू से ही कानूनी रूप से अमान्य था। बाद में किसी अधिकारी की मंजूरी से भी उसे वैधता नहीं दी जा सकती थी।
सरकार ने भी स्वीकार की जमीन की कानूनी स्थिति
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने स्वीकार किया कि संबंधित जमीन धार्मिक उद्देश्य के लिए दी गई इनाम संपत्ति थी। सरकार ने यह भी माना कि इस जमीन को दान के रूप में स्वीकार करना कानून के अनुरूप नहीं था और राजस्व विभाग इसे केवल पट्टे पर इस्तेमाल कर सकता था। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर भी सवाल उठाए। न्यायालय के अनुसार, संबंधित विभाग पहले ही यह स्पष्ट कर चुका था कि जमीन देवता की संपत्ति है और ट्रस्टी को उसे हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं है। इसके बावजूद जमीन को सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया और वहां सार्वजनिक धन से तालुक कार्यालय का निर्माण किया गया। पीठ ने कहा कि सरकार को मंदिर की संपत्ति की संरक्षक होने के नाते कानूनी स्थिति को पहले ही समझ लेना चाहिए था। बाद में गलती स्वीकार करने से पहले किए गए कार्यों की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
कार्यालय का निर्माण होने के कारण पट्टे पर जारी रहेगा कब्जा
सुप्रीम कोर्ट ने उपहार विलेख को अमान्य घोषित करने के बावजूद सरकार के पक्ष में बने पट्टे को रद्द नहीं किया। अदालत ने इस तथ्य पर विचार किया कि जमीन पर सार्वजनिक धन से तालुक कार्यालय का निर्माण हो चुका है और भवन स्थानीय प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर रहा है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी कार्यालय का निर्माण हो जाने से मंदिर के संपत्ति संबंधी अधिकार समाप्त नहीं होते। सरकार को जमीन के इस्तेमाल के बदले उचित किराया देना होगा और पट्टे की शर्तें मंदिर के हितों को ध्यान में रखकर तय की जाएंगी।
मंदिर को हर महीने 31 हजार रुपये किराया देने का आदेश
अदालत ने जमीन और भवन के मूल्य के आधार पर किराये की राशि का पुनर्निर्धारण किया। शुरुआत में मासिक किराया 13,235 रुपये तय किया गया था। बाद में लागू मूल्यांकन फॉर्मूले के आधार पर जमीन और इमारत का कुल मूल्य लगभग 3.04 करोड़ रुपये आंका गया। इसके बाद अदालत ने मासिक किराये की गणना करते हुए इसे बढ़ाकर 31,000 रुपये कर दिया। यह दर 8 मार्च 2019 से लागू मानी गई। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को पहले किए गए भुगतानों का समायोजन करने के बाद बकाया किराया तीन महीने के भीतर चुकाने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि मंदिर ट्रस्ट को कानून के अनुसार पट्टे की अवधि, नवीनीकरण और अन्य शर्तें तय करने का अधिकार होगा। किराये की समीक्षा प्रत्येक तीन साल में की जानी चाहिए और निर्धारित मासिक राशि 31,000 रुपये से कम नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे मंदिर को दिया जाना है।
धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में नियमों का पालन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग को निर्देश दिया कि धार्मिक संस्थानों की संपत्तियों से जुड़े मामलों में 1959 के अधिनियम की धारा 34, 34-A और 41 तथा संबंधित नियमों का पालन किया जाए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मंदिरों और धार्मिक संस्थानों की जमीन से जुड़े फैसले लेते समय प्रशासनिक सुविधा के बजाय संबंधित संस्थान के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस फैसले का प्रमुख संदेश यह है कि मंदिर की संपत्ति का संरक्षण और नियमन करने का अधिकार सरकार को उसे अपनी संपत्ति मानने या मनमाने ढंग से हस्तांतरित करने की अनुमति नहीं देता। धार्मिक संपत्तियों का उपयोग कानून के अनुरूप और उनके निर्धारित उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।
